वाराणसी– लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह वह क्षेत्र है जो समाज की आवाज़ बनकर सत्ता से सवाल पूछता है, भ्रष्टाचार को उजागर करता है और जनहित के मुद्दों को सामने लाता है। लेकिन विडंबना यह है कि दूसरों के अधिकारों और समस्याओं के लिए लड़ने वाला पत्रकार स्वयं आर्थिक चुनौतियों से जूझता रहता है।

आज का पत्रकार सुबह से देर रात तक खबरों के पीछे भागता है। कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस, कभी धरना-प्रदर्शन, कभी दुर्घटना स्थल तो कभी प्रशासनिक बैठकों की कवरेज। समाज की हर छोटी-बड़ी घटना को जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर होती है। इसके बावजूद उसकी अपनी जिंदगी अक्सर संघर्षों से भरी होती है।

देश में पत्रकारिता का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक बदलावों तक पत्रकारों ने अपनी लेखनी और साहस से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन वर्तमान समय में बड़ी संख्या में पत्रकार ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों और आर्थिक असुरक्षा के बीच अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।

कई मीडिया संस्थानों में पत्रकारों से रिपोर्टिंग के साथ-साथ फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, एंकरिंग, सोशल मीडिया प्रबंधन और विज्ञापन जुटाने तक की अपेक्षा की जाती है। एक व्यक्ति को पूरा मीडिया संस्थान बनकर काम करना पड़ता है। बदले में मिलने वाला पारिश्रमिक अक्सर उनकी मेहनत और जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं होता।

समाज पत्रकार को प्रभावशाली व्यक्ति मानता है। लोग उम्मीद करते हैं कि पत्रकार हर समस्या का समाधान करवा देगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि वही पत्रकार महीने के अंत में घर का बजट संभालने, बच्चों की फीस जमा करने, बिजली-पानी के बिल भरने और दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है।

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पत्रकारिता में दो समानांतर संघर्ष चलते हैं। पहला संघर्ष सच्ची और निष्पक्ष खबर जनता तक पहुंचाने का और दूसरा अपने परिवार का भरण-पोषण करने का। एक तरफ व्यवस्था से सवाल पूछने का साहस, दूसरी तरफ महंगाई और आर्थिक दबावों से जूझने की मजबूरी।

इसके बावजूद पत्रकारिता आज भी जीवित है। इसका कारण केवल पेशा नहीं, बल्कि वह जुनून और सामाजिक जिम्मेदारी है जो अनेक पत्रकारों को इस क्षेत्र से जोड़े रखती है। तमाम चुनौतियों, उपेक्षाओं और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद पत्रकार हर दिन नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतरता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को भी वह सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक मजबूती मिले जिसकी वह वास्तव में अपेक्षा रखता है। क्योंकि एक मजबूत और स्वतंत्र पत्रकारिता ही एक मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला होती है।

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बलराम
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